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Friday, July 22, 2011

देख रहा हूं आपका रीसर्च काफ़ी एक्स्टेंसिव् है

फ़िल्म : इक़बाल
किस सन में रिलीज़ हुई : 2005
किसने कहा : मोहित (नसीरुद्दीन शाह)
किससे कहा : सतीश भाटवडेकर (डी संतोष)
सम्वाद लेखक : नगेश कुकुनूर

ये एक उभरते हुए मूक बधिर तेज़ गेन्दबाज़ के संघर्ष की कहानी है. काफ़ी जद्दो जहद के बाद उन्हें आन्ध्रा की रणजी टीम में चुन लिया जाता है. वो पविलियन में बैठे होते हैं कि सतीश भाटवडेकर नाम के एक सज्जन उनसे मुख़ातिब होते हैं. वो ख़ुद को मीडिया पार्ट्नर्स नाम कि  एक खेल प्रबन्धन इदारे का नुमाइन्दा बताते हैं. इस बात से अनजान कि इक़बाल उनकी बातें सुन नहीं सकता है, वो ये दावा करते रहते हैं कि उनकी कम्पनी काफ़ी एक्स्टेंसिव रिसर्च करती है और जिस दिन से इक़बाल ने क्रिकेट फ़ील्ड पर क़दम रखा है वो उन पर नज़र रखे हुए हैं. थोडी देर जब वो बोल चुके थे, तब इक़बाल के कोच मोहित बीच में आकर सतीश को बताते हैं कि इक़बाल बोल सुन नहीं सकता. ये सुनकर सतीश चकित रह जाता है और कहता है
"क्या बात कर रहे हैं आप?"
मोहित साहब भी मौक़ा देख कर चौका मार देते हैं. कहते हैं


"देख रहा हूं आपका रीसर्च काफ़ी एक्स्टेंसिव है"


ज़ाहिर है अगर उन्होंने ढेले भर की भी रिसर्च की होती तो वो ये ज़रूर जानते कि इक़बाल सुन नहीं सकता. कॉर्परिट जगत में बहुत से लोग रिसर्च का दम भरते हैं, पर उनके दावे भी अक्सर सतीश भाटवडेकर जी के दावे की तरह खोखले होते हैं. 

Saturday, August 16, 2008

कोई भी फ़ैसला चुनाव से होना चाहिये दबाव से नहीं

फ़िल्म : सरकार
किस सन मे रिलीज़ हुई : 2005
किसने कहा : राशिद (ज़ाकिर हुसैन)
किससे कहा : अपने दल के एक सदस्य से
सम्वाद लेखक : मनीश गुप्ता

राशिद, जो की दुबई का एक डॉन है, वो मुंबई में ड्रगऔर बम आदि बेचना चाहता है। मगर उसके इरादों में हाइल है सुभाष नागरे। सुभाष नागरे मुंबई का खुदा है। पर राशिद को तो अपने काम से मतलब है। वो सुभाष को मारने का प्लान बना लेता है। इस काम में उसके सहयोगी हैं वीरेंद्र स्वामी (जीवा) और विश्राम भगत (राजू मवानी)। पर एक अन्य सहयोगी ये सुनकर बौखला जाते हैं। उसके लिए ये सोचना भी मुमकिन नहीं है, और वो अपनी सोच औरों पे ज़ाहिर करता है। वो इस प्लान का हिस्सा न बनने का इरादा कर लेता है। जैसे ही वो कमरे से बाहर निकलने लगता है, वो राशिद की आँखें देख लेता है। उसकी आँखें देखते ही वो समझ जाता है कि शायद उस कमरे से ज़िंदा निकलना उसे लिए इतना आसान नहीं होगा। अब तक देखने वाले भी ये समझ चुके हैं कि वो एक खून के चश्मदीद होने वाले हैं। और भले ही राम गोपाल वर्मा लाख चाहें की वो लीक से हट कर काम करें, कभी कभी तो वो भी अपेक्षाकृत ही करते हैं। राशिद अपने उसे सहयोगी की तरफ़ जाता है और उसके पेट में खंजर भोंक देता है। जब वो खंजर को अंतडियों में घुमाता है, उसी वक्त वो कैमरा की तरफ़ मुंह करके कहता है

"कोई भी फ़ैसला चुनाव से होना चाहिये दबाव से नहीं"